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11210 Views 15 Aug, 2019

भगवान विष्णु जी की आरती

भगवान विष्णु जी की आरती

भगवान विष्णु जी की आरती

जय जगदीश हरे, स्वामी! जय जगदीश हरे।

भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करे॥

 

जो ध्यावै फल पावै, दुख बिनसे मन का।

सुख-संपत्ति घर आवै, कष्ट मिटे तन का॥ जय...

 

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।

तुम बिन और दूजा, आस करूं जिसकी॥ जय...

 

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतरयामी॥

पारब्रह्म परेमश्वर, तुम सबके स्वामी॥ जय...

 

तुम करुणा के सागर तुम पालनकर्ता।

मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥ जय...

 

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।

किस विधि मिलूं दयामय! तुमको मैं कुमति॥ जय...

 

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।

अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥ जय...

 

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।

श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥ जय...

 

तन-मन-धन और संपत्ति, सब कुछ है तेरा।

तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा॥ जय...

 

जगदीश्वरजी की आरती जो कोई नर गावे।

कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥ जय...

कैसे करे  विष्णु जी को प्रसन 

भगवान विष्णु के तुलसी के पौधे के विवाह के पीछे एक पौराणिक कथा है। तुलसी वास्तव में वृंदा नामक एक महिला थी, जिसका विवाह जालंधर नामक एक राक्षस राजा से हुआ था। वृंदा ने भगवान विष्णु की पूजा की और अपने पति के अजेय होने की प्रार्थना की। वृंदा के कारण कोई भी जालंधर को नहीं हरा सकता था। जालंधर के अहंकार और बढ़ते पाप के कारण, भगवान विष्णु ने स्वयं जालंधर को हराने के लिए वृंदा का उल्लंघन किया। जिसके कारण वृंदा की पवित्रता नष्ट हो गई। तब एक महान युद्ध में जालंधर भगवान शिव द्वारा मारा गया था। जब वृंदा को सच्चाई के बारे में पता चला, तो उसने भगवान विष्णु को शाप दिया और उसे एक काले पत्थर (शालिग्राम) में बदल दिया और खुद को उसके पति के अंतिम संस्कार में जला दिया। तब भगवान विष्णु ने उनकी आत्मा को तुलसी के पौधे में स्थानांतरित कर दिया और आशीर्वाद के रूप में, अगले जन्म में शालिग्राम के रूप में उनसे विवाह किया। तब से तुलसी विवाह की परंपरा अस्तित्व में आई।

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