होली


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होली 2021 की तारीख व मुहूर्त

चलिए जानते हैं कि 2021 में होली की तिथि व मुहूर्त कब है। हिन्दू कैलेंडर के मुताबिक होली का त्यौहार चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को मनाते है। अगर प्रतिपदा दो दिन पड़ रही हो तो पहले दिन को ही धुलण्डी (वसन्तोत्सव या होली) के तौर पर मनाया जाता है। इस पर्व को बसंत ऋतु के आने के स्वागत के रूप में मनाते हैं। विशेषकर हरियाणा राज्य में इस त्यौहार को धुलंडी भी कहा जाता है।

होली का इतिहास

होली पर्व का उल्लेख बहुत पहले से हमें देखने को मिल जाता है। प्राचीन विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी में 11वीं शताब्दी का एक चित्र मिला था जिसमें होली के त्यौहार को साफ-साफ़ दर्शाया गया है और विंध्य पर्वतों के समीप स्थित रामगढ़ में मिले 1 ईसा से 300 साल पुराने अभिलेख में भी इसका वर्णन मिलता है।

होली से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

होली पर्व से जुड़ी अनेक कथाएँ इतिहास-पुराण में पायी जाती हैं। जैसे हिरण्यकश्यप-प्रह्लाद की जनश्रुति, राधा-कृष्ण की लीलाएँ और राक्षसी धुण्डी की कथा आदि।

रंगवाली होली के एक दिन पहले होलिका दहन करने की प्रथा है। फाल्गुन महीने की पूर्णिमा को बुराई पर अच्छाई की जीत को याद करते हुए होलिका दहन करने की परम्परा है। कथा के मुताबिक राक्षस हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद जो की प्रभु विष्णु जी का परम भक्त था, किन्तु यह बात असुर हिरण्यकश्यप को बिल्कुल अच्छी नहीं लगती थी। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद अंत करने का कार्य उसने अपनी बहन होलिका को सौंपा, जिसको अग्नि में ना जलने का वरदान प्राप्त था। प्रह्लाद को मारने के हेतु होलिका प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ गयी, लेकिन प्रह्लाद की भक्ति के कारण और भगवान विष्णु जी की के आशीर्वाद से ख़ुद होलिका ही आग में जल कर भसम हो गयी और अग्नि से भक्त प्रह्लाद को कुछ नही हुआ।

रंगवाली होली को राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम की याद में भी मनाया जाता है। एक कथा के अनुसार एक बार श्री कृष्ण जी ने माता यशोदा से पूछा कि वे राधा की तरह गोरे क्यों नहीं हैं। तभी माता यशोदा ने मज़ाक़ में श्री कृष्ण जी से कहा कि राधा के चेहरे पर रंग मलने से राधा का रंग भी उन्ही की तरह हो जाएगा। इसके बाद श्री कृष्ण जी ने राधा जी और गोपियों के साथ रंगों से होली खेली और तभी से यह त्योहार रंगों के त्योहार के रूप में मनाया जा रहा है।

एक पौराणिक कथा यह भी है कि राजा पृथु के राज्य में “धुण्डी” नाम की एक भयानक राक्षसी थी, जो मासूम बच्चों को पकड़कर खा जाती थी। धुण्डी को वरदान प्राप्त था कि कोई भी अस्त्र-शस्त्र, देवता या मनुष्य उसे नहीं मार सकेगा , लेकिन प्रभु शिव जी के एक श्राप के कारण वह बच्चों की शरारतों से नहीं बच सकती थी। इसलिए राजा पृथु को उनके राजपुरोहित ने उपाय सुझाया कि फाल्गुन महीने की पूर्णिमा के दिन, सभी बच्चे अपने हाथ में एक-एक लकड़ी लेकर एक जगह इकट्ठी करें और उनमें घास फूस रखकर आग लगा दें। फिर आग की परिक्रमा करते हुए मंत्र पढ़ें और उस राक्षसी को नगर से बाहर भगा दें। बच्चों का शोरगुल सुनकर धुण्डी आग के निकट आयी तभी सारे बच्चों ने मंत्र पढ़ते हुए धुण्डी को घेर लिया और शोरगुल करते हुए, धुण्डी पर मिट्टी-कीचड़ आदि फेंकते हुए उसे राज्य से बाहर भगा दिया। उसके बाद धुण्डी कभी वापस नहीं आयी। इस दिन की याद में भी होली मनाते हैं।

विभिन्न क्षेत्रों में होली का पर्व

कुछ जगहों पर जैसे की मध्यप्रदेश के मालवा अंचल में होली के 5वें दिन रंगपंचमी मनाई जाती है, जो मुख्य होली से भी ज्यादा ज़ोर और शोर के साथ खेली जाती है। यह त्यौहार सबसे अधिक धूम-धाम से ब्रज में मनाया जाता है। ख़ासकर बरसाना की लट्ठमार होली अधिक मशहूर है। वृन्दावन और मथुरा में भी 15 दिनों तक होली के पर्व की धूम रहती है। हरियाणा राज्य में देवर को में भाभी द्वारा सताने की प्रथा है। महाराष्ट्र में रंग पंचमी के दिन सूखे गुलाल से खेलने की प्रथा है। दक्षिण गुजरात क्षेत्र के आदिवासियों के लिए होली का यह पर्व सबसे विशेष है। छत्तीसगढ़ राज्य में लोक गीत का बहुत प्रचलन है और मालवांचल में भगोरिया मनाते है।

होली का ये पर्व जाति, वर्ग और लिंग आदि विभेदों से ऊपर उठकर प्रेम व शान्ति के रंगों को फैलाने पर्व है।